समकालिन छत्तीसगढ़ में आर्य समाज का षिक्षा के क्षेत्र में योगदान

 

डॉ.सीमा पाण्डे1, श्री गोविंद सिंह ठाकुर2

1सह प्राध्यापक इतिहास, गुरू घासीदास विष्वविद्यालय, बिलासपुर (..)

2षोध छात्र इतिहास, गुरू घासीदास विष्वविद्यालय, बिलासपुर (..)

*Corresponding Author E-mail: govindsinghthakur1234@gmail.com

 

ABSTRACT:

प्राकृतिक सौदर्य की छटा बिखरते हुए छत्तीसगढ़ अपनी सांस्कृतिक गौरव के लिए जाना जाता है। तात्कालीन समय में छत्तीसगढ़ भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेष का अविभाजित अंग था। मध्यप्रदेष का स्थानक ऐसी है कि उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पष्चिम जाने के लिए यहां से गुजरना पड़ता है। षायद यही वजह होगा कि महर्षि दयानंद का मध्यप्रदेष एवं विदर्भ में अनेक बार आगमन हुआ। महर्षि का किसी निष्चित रचनात्मक कार्यक्रम के निमित्त छत्तीसगढ़ आगमन होना विदित नहीं है। किन्तु काषी में श्री सच्चिदानंद परमहंस स्वामी के परामर्ष, ब्रम्हचारी शुद्ध चैतन्य (महर्षि दयानंद) को नर्मदा नदी के तटवर्ती तीर्थ स्थलों-चाबोद, कर्णाली, और व्यास आश्रमादि स्थानों पर जाना चाहिए, मानकर काषी से भाद्रपक्ष संवत 1904 वि. (26 अगस्त से 24 सितम्बर 1847) के बीच किसी तिथी को गुरूजनों से विदाई लेकर नर्मदा नदी के स्रोत की ओर प्रस्थान किया।

 

KEYWORDS: समकालिन छत्तीसगढ़.

 

 

 

 

प्रस्तावना -

यही वह समय था जब छत्तीसगढ़ की माटी महर्षि दयानंद सरस्वती जी के श्री चरणरज से पहली बार अनुप्राणित हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि वे काषी से पैदल चलकर विध्यांचल की ओर अग्रसर होने लगे एवं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर होते हुए अमरकंटक पहुँचे। उस समय बिलसापुर जिला के बरबसपुर, कटघोरा, रतनपुर तथा सरगुजा जिले के सोनहट, कोरिया जिले के बैकुंठपुर आदि स्थलों पर महर्षिजी के चरण रज पड़े होंगे। अत्यधिक संभावना है कि वे इन स्थलों के आसपास से होकर गुजरे होंगे।1

 

औपनिवेषिक भारत में समाज को जागृत करने एवं सनातन धर्म के प्रति लोगों में आस्था बढ़ाने के लिए महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा आर्य समाज की स्थापना सन् 1875 . में की गई एवं छत्तीसगढ़ में आर्य समाज की स्थापना रायपुर के बैजनाथपारा नामक स्थान पर 1907 . में हुआ। सन् 1909 में पडिंत लल्लू प्रसाद मालगुजार के मौहदापारा स्थित बगीचे में आर्य गुरूकुल चलाया गया। आर्य समाज मंदिर बैजनाथपारा, रायपुर शहर के मध्य गोल बाजार और सिटीकोतवाली के बीच मालवीय रोड़ स्थित है। स्थानीय आर्य समाजी लाला बैजनाथ के सत्प्रयास से सन् 1924 में आर्य समाज मंदिर बैजनाथपारा का षिलान्यास महात्मा नरायण स्वामी (दिल्ली) तथा उद्घाटन पंजाब केसरी लाल लाजपतराय द्वारा किया         गया लाला जी के नाम पर इस मोहल्ले का नाम बैजनाथपारा प्रचलित हुआ। आर्य समाज इकाई है जो की विधिवत प्रांतीय आर्य प्रतिनिधि सभा से संबंध होता है। आर्य समाज मंदिर बैजनाथपारा रायपुर विधिवत रूप से प्रांतीय संगठन से मान्यता प्राप्त है। मध्यप्रदेष सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973, सन् 1973 का क्रमांक 440 के अनुसार पंजीकृत छत्तीसगढ़ राज्य का क्रमांक 42 प्रती अर्ज प्रतिनिधि सभा से संबंध सं.क्र.-1/आर्य समाज रायपुर के पुराने सहयोगीः- पं. रविषंकर षुक्ल, श्री घनश्याम सिंह गुप्त, पं. गिरिजा प्रसाद मिश्र, पं.श्रीराम शर्मा, गौड़ श्री दुर्गाराम यदु, श्री देवीचंद अग्रवाल (वकील), नत्थानी सीताराम बहाल।

 

रा.सा.जगन्नाथ राव दानी, बाबू ईष्वर दास, अहलूलिया, बन्धु सेठं षिवा, बाबू हरिसिंह दरबार, डॉ. अर्जुन सिंह रंजीता, श्री दीनानाथ।2

 

आर्य समाज आंदोलन प्रसार प्रायः पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। यह आंदोलन केवल रूप में ही पुनरूत्थान था की तत्वों में।3 स्वामी जी ने ईष्वर, जीव और प्रकृति, तीनों को अनादि माना है, किन्तु यह तो इस्लाम से अधिक भारतीय योग-दर्षन का मत है। भिन्नता यह है कि स्वामी जी यह नहीं मानते कि भगवान पापियों के पाप को क्षमा करते है। बल्कि भगवान की कृपा के सहारे पाप करने की बात के लिए उन्होंने इस्लाम और ईसाइयत की बार-बार अलोचना की है। हाँ, जिन बुराईयों के कारण हिन्दु-धर्म को ह्रास हो रहा था तथा अन्य धर्मो के लोग जिन दुर्बलताओं का लाभ उठाकर हिन्दुओं को ईसाई बना रहे थे, उन बुराइयों को स्वामी जी ने अवष्य दूर किया, जिससे हिन्दूओं के सामाजिक संगठन में वही दृढ़ता गई जो इस्लाम में थी। स्वामी जी ने छुआ-छूत के विचार को अवैदिक बताया और उनके समाज ने सहस्त्रों अन्त्यजों का यज्ञोपवीत देकर उन्हें हिन्दुत्व के भीतर आदर का स्थान दिया। आर्य समाज ने नारियों की मर्यादा में वृद्धि की एवं उनकी षिक्षा संस्कृति का प्रचार करते हुए, विधवा-विवाह का प्रचलन किया।4

 

आर्य समाज के नियम5

1.     सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते है उन सबका आदि मूल परमेष्वर हैं।

2.     ईष्वर सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार सर्वषक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अंनत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेष्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर-अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपसना करना योग्य है।

3.     वेद सब विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यो का परम धर्म है।

4.     सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वधा अद्यत रहना चाहिए।

5.     सब काम धर्म अनुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।

6.     संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देष्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

7.     सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथा योग्य वर्तना चाहिए।

8.     अविद्या का नाष और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।

9.     प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट नहीं रहना चाहिए, अपितु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।

10.    सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहें।

 

आर्य समाज संगठनः

स्वामी दयानंद ने अपने सिद्धांतो को व्यवहारिकता देने, अपने धर्म को फैलाने तथा भारत विष्व को जाग्रत करने के लिए जिस संस्था की स्थापना की उसे आर्य समाज कहते है, आर्य का अर्थ है भद्र। अतः आर्य समाज का अर्थ है ‘‘भद्रजनों का समाज या भद्रसभा‘‘ आर्य प्राचीन भारत का प्रेमपूर्ण एवं धार्मिक नाम है जो भद्र पुरूषों के लिए प्रयोग में आता था। स्वामी जी ने देशभक्ति की भावना जगाने के लिए यह नाम चुना। यह धार्मिक से भी अधिक सामाजिक एवं राजनीतिक महत्व रखता है। इस प्रकार यह अन्य धार्मिक एवं सुधारवादी संस्थाओं से भिन्नता रखता है जैसे, ब्रम्हसमाज (ईष्वर का समाज), प्रार्थना समाज आदि।6

संगठन की दृष्टि से इसमें तीन प्रकार के समाज है। स्थानीय समाज, प्रांतीय समाज, सार्वदेषिक समाज

 

सदस्यता की नियमावली

स्थानीय समाज की सदस्यता के लिए निम्नलिखित नियमावली हैः

आर्य समाज के दस नियमों में विष्वासदेव की स्वामी दयानंद द्वारा की हुई व्याख्यादि में विष्वास सदस्य की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए। द्विजों के लिए विषेष दीक्षा संस्कार की आवष्यकता यही है किन्तु ईसाई तथा मुस्लमानों के लिए शुद्धि संस्कार की व्यवस्था है।

 

स्थानीय सदस्यः

स्थानीय सदस्य दो प्रकार के है-प्रथम जिन्हें मत देने का अधिकार नहीं, अर्थात् अस्थायी सदस्य द्वितीय, जिन्हें मत देने का अधिकार प्राप्त है, जो स्थायी सदस्य होते है। अस्थायित्व काल एक वर्ष का होता है। अस्थायित्व काल एक वर्ष का होता है। सहानुभूति दर्षाने वालों की भी अलग श्रेणी है।7

 

स्थानीय समाज के पदाधिकारी

सभापति, उपसभापति, मंत्री, कोषाध्यक्ष, पुस्कालयाध्यक्ष। ये सभी स्थायी सदस्यों द्वारा उनमें से ही चुने जाते है।

 

प्रांतीय समाज

प्रांतीय समाज के पदाधिकारी स्थानीय समाजों के प्रतिनिधि एवं भेजे हुए सदस्य होते है। स्थानीय समाज के प्रत्येक बीस सदस्य के पीछे सदस्य का प्रातीय समाज में प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। इस प्रकार इसका गठन प्रतिनिधि मूलक है।

 

आर्य समाज के नियमानुसार आर्य समाजसेवियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में आर्य समाज की गतिविधियों को अपनाया गया तथा आर्य समाज के माध्यम से समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी गई। इससे छत्तीसगढ़ प्रांत भी अछूता नहीं रहा। उस समय छत्तीसगढ़ मध्यप्रांत का भाग था, जिसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न स्थानों पर आर्य समाज की संस्थाए स्थापित की गई। रायपुर, दुर्ग, धमतरी, बिलासपुर, कांकेर, कोरबा, जांजगीर, रायगढ़ आदि स्थानों पर आर्य समाज की स्थापना हुई एवं आर्य समाज सेवियों द्वारा इन संस्थानों पर समाज सेवा के लिए कार्य किये गये जिसमें षिक्षा भी महत्वपूर्ण पहल था।

 

आर्य समाज की छत्तीसगढ़ में प्रथम शाखा 1907 . में रायपुर के बैजनाथपारा में स्थापित हुआ। इस संस्थान द्वारा शैक्षणिक गतिविधियां संचालित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से

1.     दयानंद आर्य उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, संतोषी नगर रायपुर।

2.     दयानंद आर्य पूर्व माध्यमिक माध्यमिक शाला चंगोराभाठा, रायपुर।

3.     जानकी देवी आर्य पूर्व माध्यमिक शाला, मरौद कुरूद।

 

इन विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को गुरूकुल पद्धति से षिक्षा दी जाती है। निर्धन छात्र-छात्राओं को षिक्षा में प्रोत्साहन देने के लिए कार्य किया जा रहा। इसके अलावा मेधावी एवं निर्धन छात्रों को गुरूकुल में अध्यापन हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान किया जाता है।8

 

आर्य समाज रायपुर छत्तीसगढ़ के प्रगतिषील आर्य समाजों में से है। इस आर्य समाज द्वारा केवल रायपुर के घटनाक्रमों मंे ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेष में चलने वाली गतिविधियों में भी सहयोग प्रदान किया जाता रहा है।

संचालित गतिविधियां9

1.     विवाह आदि सोलह संस्कार वैदिक विधि से योग्य पुरोहितों द्वारा।

2.     शुद्धि संस्कार।

3.     नियमित रविवासरीय साप्ताहिक सत्संग।

4.     पुस्तकालय वाचनालय संचालन आर्य साहित्य एवं यज्ञ-हवन सामग्री विक्रय केन्द्र।

5.     हजारों की संख्या में महर्षि दयानंद सरस्वती रचित अमर ग्रंथ सत्यार्य प्रकाष का पचारार्थ निःषुल्क वितरण

6.     मेधावी एवं निर्धन छात्रों को गुरूकुल में अध्यपान हेतु अर्थिक सहयोग।

 

आर्य समाज एकता के लिए अंतर्जातीय एवं अन्तर्धर्मीय विवाह संपन्न करता है। एक वैध पंजीकृत आर्य समाज मंदिर से किया गया विवाह संस्कार पूरी तरह विधि मान्य है। आर्य समाज मंदिर में विवाह संस्कार आर्य मैरिज वैलिडेषन एक्ट 1937 के अंतर्गत वैदिक रीति द्वारा संपन्न करायी जाती है, जिसके उपर हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के प्रावधान भी लागू होते है। आर्य समाज मंदिर द्वारा विवाह करना माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मान्य है।10

 

आर्य समाज मंदिर बैजनाथ पारा रायपुर में विवाह संस्कार के दौरान वर (लड़का) वधू (लड़की) की ओर से प्रस्तुत किये गये सभी दस्तावेजों जैसे आयु प्रमाण-पत्र, निवास प्रमाण पत्र, शपथ-पत्र और विवाह संस्कार के दौरान खिंची गयी फोटो पूरी तरह सुरक्षित एवं गोपनीय रखी जाती है, ताकि भविष्य में आवयकता पड़ने पर या विषम परिस्थियों में किसी प्रकार के वाद-विवाद उत्पन्न होने की दषा में माननीय न्यायालय के समझ प्रस्तुत किया जा सके और वैवाहिक स्थिति को स्पष्ट एवं प्रमाणित किया जा सके।

 

आर्य विवाह मान्यता अधिनियम 1937 के अंतर्गत प्रांतीय आर्य प्रतिनिधि सभा से संबंद्ध रखने वाले आर्य समाज इकाई ही अधिकृत है आर्य समाज मंदिर बैजनाथपारा रायपुर विधिवत रूप से प्रांतीय संगठन से मान्यता प्राप्त है।

 

विवाह आदि सोलह संस्कारों के लिए एक मात्र वैध, छत्तीसगढ़ में सर्वस पुराने लगातार 116 वर्षों से संचालित आर्य बैजनाथपारा रायपुर है।

 

आर्य समाज ने पुरूष प्रधान समाज की मिथ्या को नकारते हुए महिलाओं को भी ससम्मान स्थान दिया है। यही कारण रहा है कि आर्य समाज के प्रत्येक गतिविधियों में महिलाओं ने बढ-़चढ़कर हिस्सा लिया। छत्तीसगढ़ की स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय श्रीमती कौषल्या देवी, आर्य प्रतिनिधि सभा की वर्षो उपप्रधान एवं प्रधान रहीं तथा अपने प्रतिनिधि सभा एवं गुरूकुल होसंगाबाद के क्रियाकलापो में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। राष्ट्रीय आंदोलन में भी इनकी अक्षुण्य भूमिका रही है। महिला आर्य समाज की अनेक महिलाये विभिन्न आंदोलनो में कारावास भोग चुकी जिसमें स्वयं कौशल्या देवी, श्रीमती सुदंरबाई, श्रीमती रतना देवी तथा प्रमिला देवी, श्रीमती रोहणी बाई परगनिहा, श्रीमती भाना बाई यादव, साध्वी श्री सुविजिता जी आदि नाम उल्लेखनीय है।11

 

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में आर्य समाज अपना संदेष जन-जन तक पहुचाना चाहता था इसलिए प्रांतीय और आंचलिक भाषाओं में साहित्य लेखन को प्रोत्साहन दिया गया। छत्तीसगढ़ अंचल में सर्वाधिक लोकप्रिय बोली छत्तीसगढ़ी है। जिसमें इस अंचल के प्रसिद्ध आर्य सामाजियों ने अपने साहित्यों का लेखन किया है। कुछ लेखन कार्य हिन्दी में भी हुआ है। श्री घनष्याम सिंह गुप्त, पं.सुदंरलाल शर्मा, मिनी माता आदि आर्य सामाजियों ने साहित्य के महत्व समझते हुए, साहित्य और इतिहास को मिलाकर बहुमुल्य कृतियाँ लिखी है।12

छत्तीसगढ़ में आर्य समाज की अन्य शाखाओं में मुख्यतः दुर्ग जिला में आर्य समाज, आर्य समाज दुर्ग मठपारा के नाम से 1910 में इसकी स्थापना हुई। तथा दुुर्ग में आर्य समाज का मंदिर बनाने के लिए घनश्याम सिंह गुप्त के पिता दाऊगेंद सिंह जी ने मठपारा में भूमि दान दी थी।13 आर्य समाज दुर्ग के निर्देषन में तुलाराम आर्य कन्या उच्चतर माध्यमिक, घनश्याम सिंह गुप्त आर्य कन्या महाविद्यालय, डी..वी. मॉडल स्कूल एवं सार्वजनिक वाचनालय और होम्योपैथिक चिकित्सालय संचालित है।14

 

छत्तीसगढ़ का यह क्षेत्र भी मध्यप्रदेष एवं विदर्भ आर्य प्रतिनिधि सभा के शैक्षणिक उत्थान के कार्यो से वंचित नहीं रहा। इस अंचल में घनष्याम सिंह गुप्त कन्या महाविद्यालय दुर्ग सहित (33 लगभग) विद्यालयों का संचालन हो रहा है। सभा द्वारा प्रादेषिक आर्य विद्या परिषद् का गठन किया गया है। जिसके निर्देषन में सभी षिक्षण संस्थाओं में धार्मिक षिक्षा की व्यवस्था है, सभा द्वारा षिक्षक षिक्षिकाओं के लिए धर्म षिक्षा प्रषिक्षण षिविरों का आयोजन किया जाता है।15

 

आर्य समाज की भूमिका षिक्षा का प्रचार करना ही नही वरन समाज की बहुत सी कुरीतियों को दूर करना भी था। लेकिन समय के साथ-साथ आर्य समाजीयों का मुख्य नारा वेद और आर्य, भारत में सर्वप्रमुख हो उठा और इतिहासकारों ने भी यह धारणा बना ली कि भारत की सारी संस्कृति और सभ्यता वेदवालों अर्थात् आर्यो की रचना है।

 

भारत में जो अनेक जातियों का समन्वय हुआ था, उसकी ओर उस समय किसी ने देखा भी नही। हिन्दू केवल उत्तर भारत में ही नही बसते थे और यही कहने का कोई आधार था कि हिन्दुत्व की रचना में दक्षिण भारत का कोई योगदान नही है।16

 

इससे छत्तीसगढ़ भी अछूता नही रहा। आर्य समाजियों द्वारा सामाजिक गतिविधियों के अलावा तत्कालिन समय में सिर्फ विवाह संस्कारो पर ही कार्य किया जा रहा है। जिस उद्देष्य से स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज की स्थापना किए वे आज के परिपेक्ष्य में चरितार्थ नही हो रहा है। छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, रायगढ़, कांकेर, धमतरी विभिन्न क्षेत्रों में आर्य समाज संचालित है। लेकिन इन संस्थाओं द्वारा सक्रिय रूप से समाज के उत्थान के लिए कार्य नगण्य रूप से किया जा रहा। जिस उद्देष्य से इसकी स्थापना हुआ वह आज के परिप्रेक्ष्य में नहीं हो पा रहा है।

 

आर्य समाज जब छत्तीसगढ़ में अपनी शाखा स्थापित किया तो उनका उद्देष्य सामाजिक स्थिति को सुधारने के साथ-साथ षिक्षा में व्यापक योगदान देना रहा। आर्य समाज में महर्षि जी प्राचीन भारत की उस आर्य संस्कृति की बात करते है, जो कि विषुद्ध भारतीय है, जिस समय भारत में कोई भी विधर्मी विदेषी संस्कृतियों को आगमन नहीं हुआ था। छत्तीसगढ़ में जागृति लाने के लिए उक्त समय में टाउन स्कूलों में निबंध लेखन एवं वाद-विवाद समिति (1657) वैज्ञानिक एवं साहित्यिक समिति रायपुर (1870) रीडिंग क्लब रायपुर (1889) शालिनी रीड़िग क्लब (1891) छात्र षिक्षक संघ नार्मल स्कूल रायपुर (1894), कवि समाज राजिम (1899) आदि की स्थापना हुई। इन संस्थाओं के माध्यम से जन-जागृति का वातावरण निमित हुआ इसकी पुष्टि शासकीय रिपोर्ट में उल्लेखित है।

 

छत्तीसगढ़ में षिक्षा के प्रचार प्रसार में आर्य समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है आज के परिप्रेक्ष्य में आर्य समाज षिक्षा के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ में षिक्षा के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ में उतना प्रभाव नहीं दिखता जितना मिषनारियों तथा रामकृष्ण मिषन सोसयटी का दिखाई देता है।

 

आर्य समाज के द्वारा विभिन्न विद्यालय संचालित होती है लेकिन वहां सिर्फ वैदिक षिक्षा माात्र तक सिमट कर रह गया, जो की कही कही पाष्चात्य षिक्षा इस पर हावी हो गया है।

आज छत्तीसगढ़ में आर्य समाज की षिक्षा व्यवस्था की नगण्य नजर आती है। वह षिक्षा के क्षेत्र से हट कर अन्य क्षेत्रों में ज्यादा रूचि ले रहा है। यह आज के परिप्रेक्ष्य में विवाह संस्था के रूप में अपना छाप छोड़ चूका है। इस प्रकार इनका षिक्षा आज की षिक्षा व्यवस्था से प्रतियोगिता में कमजोर-सा प्रतीत होता है क्योंकि सरकार द्वारा संचालित गरीब कल्याण योजना के तहत विभिन्न केन्द्रिय या राजकीय विद्यालय या विष्वविद्यालयों की स्थापना की जा रही है, जो षिक्षा के क्षेत्र में महत्पूर्ण भूमिका निभा रहा है। (जैसे जवाहर नवोदय विद्यालय, केन्दीय विद्यालय) इनसे आर्य समाज का विद्यालय कही कही या निजी संस्थाओं के विद्यालयों से पिछड़ती नजर रही है। इस प्रकार हम आर्य समाज की षिक्षा व्यवस्था को देख सकते है।

 

संदर्भ ग्रंथः

1.      दयानंद सरस्वती, सत्यार्थ प्रकाष-पृ.क्र. 75

2.      वही पृ.क्र. 41

3.      ग्रोवर वी.एल., अलका मेहता, यषपाल, आधुनिक भारत का इतिहास एक नवीन मूल्यांकन, एस.चंद कंपनी प्रा.लि. दिल्ली. 2012, पृ.क्र. 273

4.      दिनकर, रामधारी सिंह, संस्कृति के चार अध्याय लोकभारती प्रकाषन, इलाहाबाद, 2016, पृ.क्र. 519

5.      वही पृ. 75

6.      वही पृ. 11

7.      वही पृ. 11

8.      https:raipuraryasamaj.org/?i=1

9.      वही पृ.-168

10.   वही पृ.-31

11.   डी..बी. सेमेटरी, महर्षि दयानंद का षिक्षा दर्षन पृ. क्र. 1

12.   आर्य समाज स्थापना शताब्दी समारो स्मारिका, आर्य प्रतिनिधि सभा विदर्भ 1975, पृ. 67

13.   डी..बी. सेमेटरी ‘‘महर्षि दयानंद का षिक्षा दर्षन‘‘ पृ. 02

14.   https:gsakm

15.   ^^ आर्य सेवक आर्य षिक्षण संस्था परिचय विषेषांक मार्च-अप्रैल 1994

16.   दिनकर रामधारी सिंह संस्कृति के चार अध्याय लोकभारती प्रकाषन, इलाहाबाद, 2016 पृ. क्र. 520-21

 

 

 

Received on 09.03.2023        Modified on 03.04.2023

Accepted on 07.05.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(2):90-95.

DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00014